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Mirza Ghalib Shayari, Life, Love, Hindi Shayari Collections

Ghalib, born mirza asadullah baig khan, 27 december 1797 was a prominent urdu and persian-language poet during the last years of the mughal empire. his interpretation of love and life continue to touch the chords of our hearts even after so many years since his passing. bskud.com have gathered a nice collection of mirza ghalib shayari.

Mirza Ghalib Shayari in Hindi

बिजली इक कौंद गयी आँखों के आगे तो क्या,
बात करते कि मैं लब तश्नए-तक़रीर भी था

पकड़े जाते हैं फरिश्तों के लिखे पर नाहक़,
आदमी कोई हमारा, दमे-तहरीर भी था ?...
आमद-ए सैलाब-ए तूफ़ान-ए सदाए आब है
नक़श-ए-पा जो कान में रखता है उंगली जादह से

बज़्म-ए-मय वहशत-कदा है किस की चश्म-ए-मस्त का
शीशे में नब्ज़-ए-परी पिन्हाँ है मौज-ए-बादा से

देखता हूं वहशत-ए शौक़-ए-ख़रोश आमादा से
फ़ाल-ए रुसवाई सिरिशक-ए सर ब सहरा-दादा से

दाम गर सबज़े में पिनहां कीजिये ताऊस हो
जोश-ए नैरनग-ए बहार-ए-अरज़-ए सहरा-दादा से

ख़ेमह-ए लैला सियाह-ओ-ख़ानह-ए मजनूं ख़राब
जोश-ए वीरानी है इश्क़-ए-दाग़-ए-बेरूं-दादा से

बज़म-ए हसती वह तमाशा है कि जिस को हम असद
देखते हैं चशम-ए अज़ ख़वाब-ए अदम नकशादा से
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं

तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं
बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे चिराग़े महफ़िल
जो तेरी बज़्म से निकला सो परीशाँ निकला
चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला...
तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई...
न होगा यक बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
हुबाब-ए-मौज-ए-रफ़्तार है, नक़्श-ए-क़दम मेरा...
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये...
ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता...

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